Santoshi Mata ki Katha - शुक्रवार संतोषी माता व्रत कथा

संतोषी माता के व्रत की कथा, आरती और विधि के बारे में जानें और इस व्रत को करने के लाभ क्या है।

शुक्रवार व्रत की विधि | संतोषी माता के व्रत कैसे रखें?

इस व्रत को करने वाला कथा कहते व सुनते समय हाथ में गुड़ व भुने चने रखें, सुनने वाला सन्तोषी माता की जय। सन्तोषी माता की जय। इस प्रकार जय-जयकार मुख से बोलते जायें।

कथा समाप्त होने पर हाथ का गुड़ चना गौ माता को खिलावें। कलश में रखा हुआ गुड़ चना सबको प्रसाद के रूप में बाटँ दें, कथा से पहले कलश को जल से भरें उसके ऊपर गुड़ चने से भरा कटोरा रखें। 

कथा समाप्त होने और आरती होने के बाद कलश के जल को घर में सब जगहों पर छिडकें और बचा हुआ जल तुलसी की क्यारी में डाल दे। 

सवा रूपये का गुड़ चना लेकर माता का व्रत करें। गुड़ घर में हो तो ले। विचार न करें क्योंकि माता भावना की भूखी है। कम ज्यादा का कोई विचार नहीं इसलिए जितना भी बन पड़े अर्पण करें, श्रद्वा और प्रेम से प्रसन्न मन हो व्रत करना चाहिए। 

व्रत के उद्यापन में अढ़ाई सेर खजा मोमनदार पूड़ी, खीर, चने का शाक, नैवेद्य रखें, घी का दीपक जला संतोषी माता की जय जयकार बोल नारियल फोड़ें। इस दिन घर में कोई खटाई न खावे और न किसी को खाने को दे। 

इस दिन आठ लड़कों को भोजन करावें, देवर जेठ के लड़के मिलते हों तो दूसरों को न बुलाना। कुटुम्ब में न मिलें तो ब्राह्मणों के रिश्तेदारों के या पड़ौसियों के लड़के बुलावें। 

उन्हें खटाई की कोई वस्तु न दें तथा भोजन करा कर यथाशक्ति दक्षिणां देवें, नगद पैसे न दे, कोई वस्तु दक्षिणा में दे, व्रत करने वाला कथा सुन प्रसाद ले एक समय भेाजन करे, इस तरह से माता प्रसन्न होगी और दुख दरिद्रता दूर होकर मनोकामना पूरी होगी।

शुक्रवार व्रत कथा वैभव लक्ष्मी माता | Shukravar Vrat Katha

एक बुढ़िया थी उसके सात पु़त्र थे, छः कमाने वाले एक निकम्मा था। बुढ़िया माँ छहों पुत्रों की रसोई बनाती भोजन कराती। जो बचता सो सातवें पुत्र को दे देती थी। 

परन्तु वह बड़ा भोला था, मन में विचार न करता था। एक दिन अपनी बहू से बोला-देखो ! मेरी माता का मुझ पर कितना प्यार है। वह बोली-क्यों नहीं। सबका जूठा बचा हुआ तुमको खिलाती है। 

वह बोला- ऐसा भी कहीं हो सकता है। मैं जब तक अपनी आँखों से न देखूं मान नहीं सकता। बहू ने कहा- देख लोगे तब तो मानोंगे। कुछ दिन बाद बड़ा त्यौहार आया। घर में सात प्रकार के भोजन व चूरमा के लड्डू बने। 

वह जांचने को सिर दर्द का बहाना कर पतला कपड़ा सिर पर ओढ़कर रसोई में सो गया और कपडे़ में से सब देखता रहा। 

छहों भाई भोजन करने आये उसने देखा माँ ने उनके लिए सुन्दर-सुन्दर आसन बिछाये, सात प्रकार की रसोई परोसी। वह आग्रह करके उन्हें जिमाती है। वह देखता रहा। 

छहों भाई भोजन करके उठे तब जूठी थालियों में से लड्डूओं के टुकडे़ उठा कर एक लड्डू बनाया, जूठन साफ कर माँ ने उसे पुकारा-उठ बेटा। 

छहों भाई भोजन कर गये अब तू ही बाकी है उठ न। कब खायेगा। वह कहने लगा माँ मुझे भोजन नहीं करना। 

मैं परदेश जा रहा हूँ। माता ने कहा कल जाता हो तो आज चला जा। वह बोला हां-हां आज ही जा रहा हूँ। यह कहकर वह घर से निकल गया। 

चलते समय बहू की याद आई, वह गौशाला में कण्डे थाप रही थी जाकर बोला। दोहा हम जावें परदेश को, आवेंगे कुछ काल। तुम रहियो संतोष से धरम आपनो पाल। 

वह बोली- जाओं पिया आनन्द से हमरो सोच हटाय। राम भरोसे हम रहे ईश्वर तुम्हें सहाय। देवो निशानी आपनी देख धरू मन धीर। सुधि हमारी न बिसारियों रखियो मन गंभीर। 

वह बोला- मेरे पास तो कुछ भी नहीं, यह अंगूठी है सो ले लो और अपनी निशानी मुझे दे, वह बोली मेरे पास क्या है यह गोबर भरा हाथ है। यह कह उसकी पीठ में गोबर के हाथ की थाप मार दी। 

वह चल दिया। चलते-चलते दूर देश में पहुंचा। वहाँ एक साहूकार की दुकान थी। वहीं जाकर कहने लगा- भाई मुझे नौकरी पर रख लो। साहूकार को जरूरत भी थी, बोला- रह जा। 

लड़के ने पूछा- तनखा क्या दोगे ? साहूकार ने कहा- काम देखकर दाम मिलेंगे। साहूकार की नौकरी मिली, वह सवेरे 7 बजे से रात तक नौकरी करने लगा। 

कुछ दिनों में साहूकार का सारा लेन देन का हिसाब, ग्राहकों को माल बेचना, सारा काम करने लगा। साहूकार के 7/8 नौकर थे, सब चक्कर खाने लगे कि यह तो बहुत होशियार बन गया। 

सेठ ने भी काम देखा और 3 महीने में उसे आधे मुनाफे का सांझीदार बना लिया और 12 वर्ष में नामी सेठ बन गया और मालिक सारा कारोबार उसके ऊपर छोड़कर बहार चला गया। 

अब बहू पर क्या बीती सुनो। सास ससुर उसे दुख देने लगे सारी गृहस्थी का काम कराके उसे लकड़ी लेने जंगल में भेजते और घर की रोटियों के आटे से जो भूसी निकलती उसकी रोटी बनाकर रख दी जाती और फूटी नारियल की नरेली में पानी। इस तरह दिन बीतते रहे। 

एक दिन वह लकड़ी लेने जा रही थी कि रास्ते में बहुत सी स्त्रियाँ संतोषी माता का व्रत करती दिखाई दी। वह वहाँ खड़ी हो कथा सुन बोली-बहिनों ! तुम किस देवता का व्रत करती हो और इसके करने से क्या फल होता है। 

इस व्रत के करने की क्या विधि है ? यदि तुम अपने इस व्रत का विधान मुझे समझाकर कहोगी तो मैं तुम्हारा बड़ा अहसान मानूंगी। 

तब उनसे एक स्त्री बोली- सुनो यह सन्तोषी माता का व्रत है, इसके करने से निर्धनता, दरिद्रता का नाश होता है, लक्ष्मी आती है, मन की चिन्ताएं दूर होती हैं। घर में होने से मन को सुख, प्रसन्नता और शांति मिलती है। 

व्रत के दिन घर में खटाई कोई न खावे। यह सुनकर बहू चल दी, रास्ते में लकड़ी के बोझ को बेच दिया और उन पैसों से गुड़ चना ले माता के व्रत की तैयारी कर आगे चली और सामने मंदिर देख पूछने लगी- यह मन्दिर किसका है ? सब बच्चे कहने लगे संतोषी माता का मंदिर है। 

यह सुन माता के मंदिर में जा माता के चरणों में लोटने लगी। दीन हो विनती करने लगी-मां ! मैं निपट मूर्ख हूं व्रत के नियम कुछ जानती नहीं मैं बहुत दुखी हूँ। हे माता जगतजननी ! मेरा दुख दूर कर मैं तेरी शरण में हूँ। 

माता को दया आई एक शुक्रवार बीता कि दूसरे शुक्रवार को ही इसके पति का पत्र आया और तीसरे को उसका भेजा पैसा भी आ पहुँचा। 

यह देख जेठानी मुंह सिकोड़ने लगी-इतने दिनों में इतना पैसा आया, इसमें क्या बड़ाई है। लड़के ताने देने लगे-कि काफी पत्र आने लगे, रूपया आने लगा, अब तो काकी की खातिर बढ़ेगी। 

अब तो काकी बुलाने से भी नहीं बोलेगी। बेचारी सरलता से कहती- भैया पत्र आवे, रूपया आवे तो हम सबके लिए अच्छा है। 

ऐसा कहकर आंखों में आँसू भरकर संतोषी माता के मन्दिर में आ मातेश्वरी के चरणों में गिरकर रोने लगी-मां मैंने तुमसे पैसा नहीं माँगा। मुझे पैसे से क्या काम है। मुझे तो अपने सुहाग से काम है। 

मैं तो अपने स्वामी के दर्शन और सेवा माँगती हूं। तब माता ने प्रसन्न होकर कहा जा बेटी ! तेरा स्वामी आयेगा। यह सुन खुशी से बावली हो कर घर जा काम काज करने लगी। 

अब संतोषी माँ विचार करने लगी- इस भोली पुत्री से मैंने कह तो दिया तो पति आवेगा, पर आवेगा कहाँ से, वह तो इसे स्वप्न में भी याद नहीं करता। उसे याद दिलाने के लिए मुझे जाना पडे़गा। 

इस तरह माता बुढ़िया के स्वप्न में जा प्रकट हो कहने लगी- साहूकार के बेटे ! सोता है या जागता है ! वह बोला माता ! सोता भी नहीं हूँ जागता भी नहीं हूँ ,बीच में ही हूं कहो क्या आज्ञा है। 

माँ कहने लगी-तेरा घर बार कुछ है या नहीं। वह बोला मेरा सब कुछ है मां-बाप, भाई-बहन व बहू, क्या कमी है। मां बोली – भोले पुत्र ! तेरी स्त्री घोर कष्ट उठा रही है । तेरे मां बाप उसे दुख दे रहे है। वह तेरे लिए तरस रही है तू , उसकी सुधी ले। 

वह बोला माता ! यह तो मुझे मालूम है परन्तु जाऊं कैसे ? परदेश की बात है, लेन देन का कोई हिसाब नहीं, जाने का कोई रास्ता नज़र नहीं आता, कैसे चला जाउँ ? 

मां कहने लगी मेरी बात मान सवेरे नहा-धोकर माता का नाम ले घी का दीपक जला दंडवत कर दुकान पर जा बैठना। देखते देखते तेरा लेन-देन चुक जाएगा। 

माल बिक जायेगा साँज होते-होते धन का ढेर लग जायेगा। तब सवेरे बहुत जल्दी उठ उसने लोगों से अपने सपने की बात कही तो वे सब उसकी बात अनसुनी कर दिल्लगी उड़ाने लगे कहीं सपने भी सच होते हैं। 

एक बूढ़ा बोला-देख भाई ! मेरी बात मान, इस तरह साँच झूठ करने के बदले देवता ने जैसा कहा है वैसा ही करना। तेरा इसमें क्या जाता है?

अब बूढ़े की बात मान वह नहा-धोकर संताषी माता को दंडवत कर, घी का दीपक जला कर दुकान पर जा बैठा। थोड़ी देर में क्या देखता है कि देने वाले रूपया लाए, लेने वाले हिसाब लेने लगे, कोठे में भरे सामानों के खरीददार नगद दाम में सौदा करने लगे। शाम तक धन का ढेर लग गया। 

माता का यह चमत्कार देख खुश हो मन में माता का नाम ले, घर जाने के वास्ते गहना कपड़ा खरीदने लगा और वहाँ के काम से निपट कर तुरन्त रवाना हुआ। 

वहाँ बहू बेचारी जंगल में लकड़ी लेने जाती है, लौटते वक्त माता जी के मन्दिर में विश्राम करती है। वह तो उसका रोज रूकने का स्थान ठहरा। 

दूर से धूल उठती देखकर वह माता से पूछती है हे माता ! यह धूल कैसी उड़ रही है ? मां कहती है हे पुत्री ! तेरा पति आ रहा है। 

अब तू ऐसा कर लकड़ियों के तीन बोझ बना ला एक नदी के किनारे रख दूसरा मेरे मंदिर पर और तीसरा अपने सिर पर रख। 

तेरे पति को लकड़ी का गट्ठा देख मोह पैदा होगा। वह वहां रूकेंगे नाश्ता पानी बना खा पीकर माँ से मिलने जायेगा, तब तू लकड़ी का बोझा उठाकर जाना और बीच चौक के गट्ठा डालकर तीन आवाजें लगाना लो सासूजी ! 

लकड़ियों का गट्ठा लो, भूसे की रोटी दो और नारियल के खोपड़े में पानी दो आज मेहमान कौन आया है ? मां की बात सुन बहुत अच्छा माता ! कहकर प्रसन्न हो लकड़ियों के तीन गट्ठे ले आई। 

एक नदी के तट पर, एक माता के मन्दिर पर रखा। इतने में ही मुसाफिर आ पहुँचा। 

सूखी लकड़ी देख उसके पति की इच्छा हुई कि यही निवास करे और भोजन बना खा पीकर गाँव जाए। इस प्रकार भोजन बना विश्राम करके वह गाँव को गया, जब वह सबसे प्रेम से मिल रहा था, उसी समय बहू सिर पर लकड़ी का गट्ठा लिए आती है। 

लकड़ी का भारी बोझ आँगन में गेर जोर से तीन आवाज देती है। “लो सासूजी ! लकड़ी का गट्ठा लो, भूसे की रोटी दो, नारियल के खोपड़े में पानी दो, आज मेहमान कौन आया है ? 

यह सुनकर उसकी सास अपने दिए हुए कष्टों को भुलाने हेतु कहती है, बहु ! ऐसा क्यों कहती है तेरा मालिक ही तो आया है। आ बैठ मीठा भात खा, भोजन कर, कपड़े गहने पहन। 

इतने में आवाज सुन उसका स्वामी बाहर आता है और अंगूठी देख व्याकुल हो मां से पूछता है। माँ यह कौन है। माँ कहती है बेटा यह तेरी बहू है। आज 12 वर्ष हो गए जब से तू गया है। 

तब से सारे गाँव में जानवर की तरह भटकती रहती है। काम काज घर का कुछ नहीं करती है। चार समय आकर खा जाती है। 

अब तुझे देखकर भूसी की रोटी और नारियल के खोपड़े में पानी माँगती है। वह लज्जित हो कर बोला ठीक हे माँ ! मैंने इसे भी देखा है और तुम्हें भी देखा है। अब मुझे दूसरे घर की ताली दे तो उसमें रहूं। 

तब मां बोली ठीक है बेटा जैसी तेरी मर्जी, कहकर ताली का गुच्छा पटक दिया। उसने ताली ले दूसरे कमरे में जो तीसरी मंजिल के ऊपर था। 

खोलकर सारा सामान जमाया एक दिन में ही वहाँ राजा के महल जैसा ठाट-बाट बन गया। अब क्या था, वे दोनो सुखपूर्वक रहने लगे। 

इतने में अगला शुक्रवार आया। बहू ने अपने पति से कहा कि मुझको मां का उद्यापन करना है। वह तुरन्त ही उद्यापन की तैयारी करने लगी। 

जेठ के लड़को को भोजन के लिए कहने गई। उन्होंने मंजूर किया परन्तु पीछे जेठानी बच्चों को सिखाती है देखो रे ! भोजन के समय खटाई मांगना। 

जिससे उसका उद्यापन पूरा न हो। लड़के जीमने आए। खीर पेट भरकर खाई। परन्तु याद आते ही कहने लगे हमें कुछ खटाई दो खीर खाना हमें भाता नहीं। 

देख कर अरूचि होती है बहू कहने लगी खटाई किसी को नहीं दी जायेगी, यह तो संतोषी माता का प्रसाद है। लड़के उठ खड़े हुए बोले पैसे लाओ। 

भोली बहु कुछ जानती नहीं थी सो उन्हें पैसे दे दिए। लड़के उसी समय उठ इमली लाकर खाने लगे। यह देखकर बहू पर माताजी ने कोप किया।

राजा के दूत उसके पति को पकड़कर ले गए। जेठ-जेठानी मनमाने खोटे वचन कहने लगे। लूट-लूटकर धन इकट्ठा कर लाया था सो राजा के दूत उसको पकड़कर ले गए। अब सब मालूम पड़ जायेगाा जब जेल की मार खाएगा।  बहू से वचन सहन नहीं हुए। 

बहू रोती-रोती माता के मन्दिर में गई। हे माता ! तुमने यह क्या किया। हंसाकर अब क्यों रूलाने लगी। माता बोली पुत्री ! तूने उद्यापन करके मेरा व्रत भंग किया इतनी जल्दी सब बातें भुला दीं। 

वह कहने लगी, माता भूली तो नहीं हूं न कुछ अपराध किया है। मुझे तो लड़को ने भूल में ड़ाल दिया। मैंने भूल से उन्हें पैसे दे दिए मुझे क्षमा करो। मां। मां बोली ऐसी कहीं भूल होती है ? 

वह बोली मां मुझे माफ कर दो मैं फिर तुम्हारा उद्यापन करूंगी।

मां बोली अब भूल जा पुत्री तेरा मालिक तुझे रास्ते में ही आता मिलेगा। वह घर को चली, रहा में पति आता मिला । उसने पूछा कहाँ गए थे ? 

तब वह कहने लगा-इतना धन जो कमाया है उसका टैक्स राजा ने मांगा था, वह भरने गया था। वह प्रसन्न हो बोली-भला अब घर चलो। 

कुछ दिन बाद फिर शुक्रवार आया। वह बोली मुझे माता का उद्यापन करना है। पति ने कहा करो फिर जेठ के लड़कों से भोजन को कहने गई। 

जेठानी ने एक दों बातें सुनाई और लड़कों को सिखा दिया कि तुम पहले ही खटाई मांगने लगना। लड़के कहने लगे, हमें खीर खाना नहीं भाता, जी बिगड़ता है, कुछ खटाई खाने को देना। 

वह बोली खटाई खाने को नहीं मिलेगी, खाना हो तो खाओ। वह ब्राह्मण के लड़कों को लाकर भोजन कराने लगी। यथाशक्ति दक्षिणा की जगह एक-एक फल उन्हें दिया। इससे सन्तोषी मां प्रसन्न हुई। 

माता की कृपा होते ही नवें मास उसको चन्द्रमा के समान सुन्दर पुत्र प्राप्त हुआ। पुत्र को लेकर प्रतिदिन माता जी के मंदिर जाने लगी, मां ने सोचा कि वह रोज आती है क्यों न मैं इसके घर चलूं इसका आसरा देखूं तो सही। 

यह विचार कर माता ने भयानक रूप बनाया। गुड़ और चने से सना मुख ऊपर सूंड के समान होंठ, उस पर मक्खियाँ भिनभिना रही थी। 

देहलीज में पाँव रखते ही उसकी सास-चिल्लाई- देखो रे ! कोई चुडैल चली आ रही है। लड़को इसे भगाओ नहीं तो किसी को खा जाएगी। 

लड़के डरने लगे और चिल्लाकर खिड़की बन्द करने लगे। बहू रोशनदान से देख रही थी। प्रसन्नता से पागल होकर चिल्लाने लगी- ‘आज मेरी माता मेरे घर आई है ? यह कहकर बच्चे को दूध पीने से हटाती है। 

इतने में सास का क्रोध फूट पड़ा। बोली-रांड इसे देखकर कैसी उतावली हुई है। जो बच्चे को पटक दिया। इतने में मां के प्रताप से जहां देखो वहीं लड़के ही लड़के नजर आने लगे। वह बोली-मां जी ! जिनका मैं व्रत करती हूं। यह वहीं सन्तोषी माता हैं। 

इतना कह झट से सारे घर के किवाड़ खोल देती है। सबने माता के चरण पकड़ लिए और विनती कर कहने लगे-हे माता ! हम मूर्ख है, हम अज्ञानी हैं, पापी हैं। 

तुम्हारे व्रत की विधि हम नहीं जानते, तुम्हारे व्रत भंग कर हमने अपराध किया हैं। हे माता ! आप हमारा अपराध क्षमा करो। 

उस प्रकार माता प्रसन्न हुई। माता ने बहू को जैसा फल दिया वैसा माता सबको दे। जो पढ़े उसका मनोरथ पूर्ण हो।

शुक्रवार संतोषी माता की आरती | Shukravar Vrat Katha Aarti

जय संतोषी माता,
मैया जय संतोषी माता।
अपने सेवक जन को,
सुख संपत्ति दाता ।। 

सुन्दर चीर सुनहरी,
मां धारण कीन्हों।
हीरा पन्ना दमके,
तन श्रृंगार लीन्हों ।। 

मेरु लाल छटा छवि,
बदन कमल सोहै।
मन्द हंसत करूणामयी,
त्रिभुवन मन मोहै ।। 

स्वर्ण सिंहासन बैठी,
चंवर ढुरें प्यारे।
धुप, दीप, मधुमेवा,
भोग धरें न्यारे ।। 

गुड़ अरू चना परमप्रिय,
तामे संतोष कियो।
संतोषी कहलाई,
भक्तन वैभव दियो ।। 

शुक्रवार प्रिय मानत,
आज दिवस सोही।
भक्त मण्डली छाई,
कथा सुनत मोही ।। 

भक्ति भावमय पूजा
अंगीकृत कीजै।
जो मन बसै हमारे
इच्छा फल दीजै ।। 

मन्दिर जगमग ज्योति,
मंगल ध्वनि छाई।
विनय करें हम बालक,
चरनन सिर नाई ।। 

दुखी, द्ररिद्री, रोगी,
संकट मुक्त किये।
बहु धन-धान्य भरे घर,
सुख सौभाग्य दिये ।। 

ध्यान धरयो जिस जन ने,
मनवांछित फल पायो।
पूजा कथा श्रवण कर,
घर आनन्द आयो ।। 

शरण गहे की लज्जा,
रखियो जगदम्बे।
संकट तू ही निवारे,
दयामयी मां अम्बे ।। 

संतोषी मां की आरती,
जो कोई नर गावे।
ऋद्धि-सिद्धि, सुख-संपत्ति,
जी भरके पावे ।।

शुक्रवार व्रत के लाभ

इस व्रत को करने से निर्धनता, दरिद्रता का नाश होता है, लक्ष्मी आती है।
इससे मन की चिंताए दूर होती है।
घर में होने से मन को सुख, प्रसन्नता और शांति मिलती है।

1) संतोषी माता के व्रत में क्या खाना चाहिए क्या नहीं? इस दिन आप खट्टे फल, सब्जी आदि चीजें ना खाएं। आप फल, दूध, रोटी, हलवा, गुड़, चना आदि चीजें खा सकते है। 

2) शुक्रवार के दिन संतोषी माता के व्रत में तरबूज खा सकते है? हाँ

3) शुक्रवार के व्रत में मूंगफली खा सकते है क्या? हाँ

4) शुक्रवार व्रत कब खोले? शुक्रवार के दिन ही सुबह कथा और आरती सुनने के बाद व्रत खोले।

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Song: Shukravar Vrat Katha Santoshi Mata ki Katha
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Santoshi Mata ki Katha - शुक्रवार संतोषी माता व्रत कथा. The "Santoshi Mata Vrat" is a Hindu ritual  dedicated to the goddess Santoshi Mata. It is celebrated on the 16th day of the Hindu month of Jyeshtha and is observed for 16 consecutive Fridays. The vrat is observed mainly by married women. The devotees of Santoshi Mata observe this vrat in order to seek blessings of the goddess for the well-being of their family and for the fulfillment of their wishes and desires. 

The traditional practice of observing this vrat is to fast on all the 16 Fridays and offer prayers to Santoshi Mata. Devotees break their fast at the end of the day after offering prayers and offering fruits, flowers and other items to the idol of the goddess. During the vrat, devotees also perform charitable acts such as providing meals to the needy and poor. It is believed that observing this vrat brings good luck, wealth, prosperity and contentment in life.

According to the legend, Santoshi Mata was the daughter of Lord Ganesha and was created to pacify Goddess Parvati's anger. The fast is believed to be beneficial for unmarried girls in search of a suitable match, married women seeking marital bliss, and people seeking relief from ailments.

The Santoshi Mata Vrat involves the worship of the goddess and involves the offering of food items such as rice, jaggery, and sesame seeds. The devotees should also chant the mantras of the goddess and observe certain religious rules. On the final day of the Vrat, the devotees should offer a coconut to the goddess and distribute prasad (food) to others.

Traditional Santoshi Mata Vrat Puja Vidhi 

1. Take a bath on the morning of the fast.
2. Wear a clean and fresh set of clothes.
3. Place the idol of Goddess Santoshi Mata in the puja area.
4. Offer fresh flowers, fruits and sweets to the Goddess.
5. Light incense and diyas(lamps).
6. Chant the mantras of Santoshi Mata like “Om Santoshi Mata Namah”.
7. Offer aarti and pray for the well being of all.
8. Recite the Santoshi Mata Chalisa with devotion.
9. Break the fast with some prasad (offering) to the Goddess.